Wednesday, July 9, 2008

१ अपने होने ना होने से होता है क्या? काम दुनिया का यूं भी तो चल जायेगा! (ज़ाहिद)

ग़ालिब-ऐ-खास्ता के बगैर कौन से काम बंद हैं? रोईए ज़ार ज़ार क्यों, कीजिये हाय हाय क्यों? (ग़ालिब)

रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ (अहमद फ़राज़)

कतई कीजे ना ताल्लुक हमसे कुछ नहीं है तो अदावत ही सही (ग़ालिब)

३बेखुदी ले गई कहाँ हमको? देर से इंतज़ार है अपना! (मीर)

हम वहाँ हैं जहाँ से, हमको कुछ हमारी ख़बर नहीं आती (ग़ालिब)

कहाँ मयखाने का दरवाजा 'ग़ालिब' और कहाँ वाइज़? पर इतना जानते हैं की कल वो जाता था की हम निकले (ग़ालिब)

मयखाने की बात ना कर वाइज़ मुझसे आना जाना तेरा भी है मेरा भी! (शाहिद कबीर)

शेख जो था मस्जिद मे नंगा, रात को था मयखाने जुब्बह, खिरका, कुरता, टोपी, मस्ती मे इनाम किया! (मीर)

५ मयकदे बंद करें लाख ज़माने वाले, कम नहीं हैं आंखों से पिलाने वाले

इक सिर्फ़ हमीं हैं जो आंखों से पिलाते हैं, कहने को तो दुनिया मे मयखाने हजारों हैं (शहरयार

६सब करिश्मात-ऐ-तसव्वुर है 'शकील', वरना आता है ना जाता है कोई (शकील)

रात भर पिछली ही आहट कान मे आती रही, झाँक कर देखा गली मे कोई भी आया न था (अदीम)

७ नहीं फुरसत यकीन मानो हमें कुछ और करने की तेरी बातें तेरी यादें बहुत मसरूफ रखती है

उनकी याद, उनकी तमन्ना, उनका गम कट रही है ज़िंदगी आराम से

८।दुनिया बनाने वाले, क्या तेरे मन मे समाई? काहे को दुनिया बनाई?

नक्श फरियादी है ये किसकी शोखी-ऐ-तहरीर का? कागजी है पैरहन हर पैकर-ऐ-तस्वीर का (ग़ालिब)

९। ये इश्क नहीं आसान, इतना तो समझ लीजे इक आग का दरिया है और डूब के जाना है

शायद इसी का नाम मुहब्बत है, 'शेफ्ता' इक आग सी है दिल मे हमारे लगी हुई (शेफ्ता)

१०। उस मोड़ से शुरू करें फिर ये ज़िंदगी हर शेह जहाँ हसीं थी, हम तुम थे

अजनबी
चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों (साहिर लुधियानवी)

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